Wednesday, 29 June 2016

छोटूमल और सांप


झील किनारे घूम रहा था
इक दिन छोटा छोटूमल
घास में देखा एक सांप
और ठिठक गया उसी पल
सांप रेंग रहा था धीरे-धीरे
अपने में ही था वो खोया
उसे लगा सांप बेचारा
कई रात का था न सोया
छोटूमल को उस सांप पर
आई खूब दया
सोचा ‘इस बेचारे के लिए
मैं कर सकता हूँ क्या’
छोटूमल को देख
सांप को आने लगी रुलाई
छोटूमल ने देखा रुक कर
सांप की आँखें थीं भर आई
छोटूमल था बेचारा
दिल का बहुत ही नरम
दिल की सुन वह करता था
सहायता सब की हर दम
सांप से उसने पूछा 'मित्र  
क्यों हैं आँखों में आंसू
मुझे बताओ हो सकता है
मैं ही कुछ कर पाऊं’
सांप ने उसको देखा
और कहा ज़रा सम्भल कर 
‘कई दिनों से आता बुखार
मुझे को रुक रुक कर 
 काँटा कहीं चुभ गया है
पेट में बहुत ही गहरे
इस कारण वन में मुझ को  
सब दिखते हैं हरे-हरे
दस दिनों से नहीं है
मैंने कुछ भी खाया
और दाँत के दर्द ने
है मुझे बहुत सताया 
मन मेरा करता है 
मैं देश-विदेश घूम आऊँ
यह दुनिया कैसी है
सब कुछ मैं देख आऊँ
कई सांप उड़ सकते हैं
ऐसा मैंने सुना है
मैं भी उड़ूं पक्षियों सा
मेरा मन कहता है
रात में सोने के लिए
अपना हो इक सुंदर घर
 नाव में चढ़ कर चाँदनी रात में   
घूमूं झील में इधर उधर’
सांप की बातें सुन
छोटूमल हुआ बहुत हैरान
उसे लगा उसके तो
पक जायेंगे दोनों कान
‘तुम्हारी इच्छाओं की
सूची है अधिक ही लंबी
पर एक इच्छा तुम्हारी
 कर सकता हूँ पूरी अभी-अभी  
एक मेंडक मुझे मिला था
वहां उस लट्ठे के ऊपर 
यह खा सकते हो तुम
अच्छे लगते हों मेंडक अगर.’
पास आकर छोटूमल ने
रखा मेंडक धरती पर
सांप ने उसके देखा
पर अपना फन फैला कर
‘यह मेंडक रख छोड़ा था
उस लट्ठे पर मैंने ही 
तुम हो निरे बुद्धू
मैंने फांस लिया है तुमको भी 
मैं भूखा हूँ कई दिनों का
खाना चाहूँ इक बड़ा शिकार
तुम हो खूब मोटे ताज़े   
बच न पाओगे तुम मेरे यार'
सांप की बात सुनकर
छोटूमल के उड़ गए होश
पर फंसा था वो अपने ही कारण
किस को देता अब वो दोष
दुष्ट जनों की सहायता
करने में था न कोई सार
जान बचाने को छोटूमल दौड़ा
ऐसे वो दौड़ा था पहली बार

©आइ बी अरोड़ा  

Friday, 24 June 2016

पानी का डर

नन्हें हाथी को लगता था
पानी से थोड़ा डर
फिर भी हर दिन नदी में
उसको जाना पड़ता था पर
माँ थी उसकी ज़रा कठोर
गुस्सा आता उसको नन्हें हाथी पर
अगर नहाने में वो नन्हा हाथी
करता कभी किन्तु अगर मगर पर
नन्हें हाथी ने इक दिन देखी
नदी में जाती इक नाव
नाव देख उसके मुंह से निकला  
‘वाओ वाओ वाओ
ऐसी निराली चीज़ तो मैंने  
न देखी थी कहीं आज तक
मुझे भी चाहिये ऐसी नाव
लेकर रहूँगा मैं अपना हक़’
झटपट आकर माँ से बोला
कही उससे मन की बात
फ़रमाईश सुन माँ झुंझलाई
और सर अपने पर मारा हाथ
तभी नदी में बहती देखी माँ ने
कागज़ की इक सुंदर नाव
माँ बोली, ‘जाओ नदी में जल्दी से  
और पकड़ लो वह बहती नाव’
नन्हा हाथी दौड़ा झटपट
और भूल गया पानी का डर
बड़ी फुर्ती से लगा तैरने
नाव वो पकड़ न पाया पर
लौट कर वो माँ से बोला,
‘नाव तो खो गई पानी में’
‘तुम ऐसे तैर पाओगे बेटा  
सोचा न था मैंने कभी सपने में
तुम्हें आज तो पानी से
लगा न बिलकुल भी डर
मैं तो सदा ही कहती थी
कि तुम हो सबसे अधिक निडर’  
नन्हा हाथी उछल पड़ा
सुन माँ से अपनी प्रशंसा
खूब अकड़ कर वह बोला
‘माँ, मैं तो हूँ ही ऐसा.’

©आइ बी अरोड़ा 

Wednesday, 22 June 2016

बौना सियार
जंगल में रहता था इक बौना सियार
उस बेचारे बौने का था न कोई यार
शिकार पकड़ने में था वो थोड़ा कच्चा
इस कारण हरदम खा जाता था वो गच्चा
दस बार करता था कोशिश फिर भी रह जाता था भूखा
मुसीबत बढ़ जाती थी जब वन में पड़ जाता था सूखा
उस जंगल में ही रहता था एक घमंडी बाघ
देख उसे सब डर जाते थे और झटपट पड़ते थे भाग
सब कतराते थे बाघ से कोई न रहता था उसके साथ
हर पल रहता था अकेला कोई न करता था उससे बात
इक दिन सियार ने यूँ सोचा, ‘अगर करूं दोस्ती बाघ से  
झूठन ही दे देगा मुझको शायद वो अपने शिकार से’ 
बाघ के कान लगा अब सियार मीठी बातों से भरने
अवसर मिलते ही वो लग जाता उसकी सेवा करने
चिकनी चुपड़ी बातों पर किस का मन न डोला
एक दिन मुस्कुरा कर घमंडी बाघ यूँ सियार से बोला,
‘तुम्हारी मीठी-मीठी बातें लगतीं मुझको बहुत ही अच्छी
हम दोनों अब साथ रहेंगे बात कहूँ मैं बिल्कुल सच्ची.’
अब सियार के दिन पलटे खूब मज़े से था खाता
बाघ के हर शिकार में वो भी था थोड़ा हिस्सा पा जाता  
पर घमंडी बाघ धूर्त बहुत था करता था न सही व्यवहार
सियार बेचारे को हर दम दौड़ाता था वो बारंबार
इक खरगोश कहीं से आ पहुंचा इक दिन उस वन में
इसे चबा कर खाऊं बात आई घमंडी बाघ के मन में
बाघ ने सियार को पास बुलाया और ज़ोर से चिल्लाया
‘पकड़ो इस खरगोश को तुम इसको खाने का मन कर आया’
सियार बेचारा सहम गया और हुआ बहुत हैरान
वो जानता था कि न कर पायेगा वो ऐसा काम 
फिर भी झटपट भागा और इधर-उधर वो दौड़ा
खरगोश का पीछा करते-करते वन का कोई कोना न छोड़ा
खरगोश का पीछा उस बेचारे ने दिन भर खूब किया
सांझ हुई तो नदी किनारे रुक कर थोड़ा पानी पीया
लौट आया फिर वह सिर अपना लटकाए
लेकिन खाली हाथ लौटने पर उसने बाघ के घूंसे ही खाए
सियार की आँखों से आंसू लगे झरझर बहने
धूर्त बाघ के अत्याचार पड़े थे उसको कई बार सहने
गुमसुम खोया खोया सा वो आ बैठा झील किनारे
नभ में देखा चमक रहा था चाँद और कई सितारे
चाँद के दब्बों को देख उसके मन आई इक बात
बाघ को सबक सिखाने को यह थी अच्छी रात
बाघ से उसने यूँ कहा पर थोड़ा अदब से झुककर
‘बात मेरी सुन लें श्रीमान आप थोड़ा यहाँ रूककर
बदमाश खरगोश छिप गया है चाँद के ऊपर चढ़ कर
चाँद अभी तो है आकाश में सीधा हम सब के ऊपर
पर श्रीमान चाँद को कुछ देर में नीचे आना ही होगा
बड़ी झील के रास्ते ही चाँद को अपने घर जाना होगा
तब झील में कूद कर जा सकते है चाँद के ऊपर आप
और उस खरगोश को पकड़ चबा कर खा सकते हैं आप’
ऊपर आकाश की ओर देखा तब उस घमंडी बाघ ने
चाँद पर देखी एक परछाई और सारी बात आई समझ में
देर रात में दोनों आये चुपचाप झील किनारे
वन के पशु-पक्षी सोये थे तब गहरी नींद में सारे
जैसे ही चाँद दिखाई दिया उस झील के अंदर
बाघ ने कूद लगाई पर चढ़ न पाया चाँद के ऊपर  
एक मगरमच्छ भी रहता था उस झील में सबसे छिप के
झील में कोई आता तो नथुने फूल जाते थे उसके
मगरमच्छ था सोया जब लगाई बाघ ने छलांग
मगरमच्छ ने मारा झपटा और पकड़ ली उसकी दायीं टाँग
‘छोड़ो मुझे, चाँद पर छिपे खरगोश का करना है मुझे शिकार
अगर खरगोश भाग गया तो कोशिश हो जायेगी मेरी बेकार’
सुन बाघ की बात आई मगरमच्छ को खूब हंसी
पर बाघ की टाँग रही तब भी उसके दांतों में फंसी
‘मूर्ख, जो दिखता है पानी में वो चाँद नहीं है उसकी परछाई
और चाँद पर जो है, वो खरगोश नहीं, है मेरा इक दुष्ट भाई’
अब समझा बाघ कि सियार ने उसको था मुसीबत में फंसाया  
सियार पर किये अत्याचारों का फल था उसने पाया
अपनी जान बचाने को बाघ ने किये बहुत प्रयास
और चिल्ला कर सियार को भी पुकारा पर वो न आया पास
हाथ पैर अपने तब घमंडी बाघ ने खूब चलाये
न चाह कर भी उसके मुंह से निकल गयी इक हाय
बहुत मशक्त करने पर ही उसने पाया छुटकारा
पर इतने में ही घमंड उसका टूट चुका था सारा
बाहर आकर उसने पाया टूट चुकी थी उसकी टाँग
अब न वो दौड़ सकेगा न लगा पायेगा कोई छलांग
बाघ की हालत देख कर कोई पशु न हुआ हैरान
अब बाघ न कर पायेगा अपनी शक्ति पर अभिमान
जंगल में रहता है इक बौना सियार
वन के कई पशु हैं उस बौने के यार
शिकार पकड़ने में अब भी है वो थोड़ा कच्चा
पर मित्रों के संग सब कुछ खाता है मित्रों का संग है सच्चा.

© आइ बी अरोड़ा 

Monday, 13 June 2016

A  Blue Star, an a to z poem


A star looked at me
with a twinkle in its eye
Blue star it was
and I know why
Cheeky are blue stars
and they are real hot
During the day
they like to sleep a lot
Evening comes but
they are slow to get up
For all through the night
they shine and stand up
Gathered in groups
scattered in the sky
Heavens glitter
and we all know why
It is an endless fire
that keeps burning
Jewels shoot out that
stars keep emitting
Knights of the sky
with armours shinning
Look like specks of light
and ever gleaming
Millions of stars
are out in the sky
No, you can’t see all
with a naked eye
Oh! Beautiful are stars
on a moonless night
Pure joy they are
and night after night
Quaint are the stars
like magical lights
Rarely are they sad
even on cloudy nights
Shinning like pearls
on a clear black sky
They love to twinkle
in twinkling of an eye
Umpteen times
I have wanted a star
Vainly I have tried to
catch a shooting star
What you see in my hand
papa got it from a mall
Xmas star it is
and it is brightest of all
Yes, I love blue stars
shinning in the sky
Zany you think I am
and I know why.

©i b arora