Tuesday, 31 March 2015

अप्रैल फूल
(पहला भाग)

मार्च का अंतिम दिन था. भेड़िये ने सियार से कहा, “अरे यार, कल किस सज्जन को मूर्ख बनाया जाये.”

“कल क्या ख़ास बात है?” सियार ने पूछा.

“भूल गये? कल पहली अप्रैल है. हर वर्ष पहली अप्रैल के दिन हम किसी न किसी को मूर्ख बनाते ही हैं.”

दोनों किसी को मूर्ख बनाने की योजना बनाने लगे. तभी उन्होंने खिड़की से हिरण को अपने घर जाते हुए देखा.

“क्यों न इसे मूर्ख बनाया जाये?” सियार ने हिरण की ओर संकेत करते हुए कहा.

“हां, यह बड़ा ही भोला-भाला प्राणी है. इसे तो सरलता से मूर्ख बना सकते हैं,” भेड़िये ने कहा.

अगले दिन सियार और भेड़िया मिल कर अपनी अक्ल के घोड़े दौड़ने लगे. परन्तु हिरण को कैसे मूर्ख बनाया जाये, उन्हें सूझ ही न रहा था.

“अरे, हद हो गई, कुछ भी नहीं सूझ रहा और दिन निकला जा रहा है,” सियार ने कहा.

“अब तो हिरण बैंक से वापस भी आ गया होगा,” भेड़िये ने कहा. हिरण ‘अपना बैंक’ में काम करता था.

“अरे हां, वह तो बैंक में काम करता है. क्यों न हम फोन कर उसे कहें कि  आज रात हम ‘अपना बैंक’ लूटने वाले हैं. उसके होश उड़ जायेंगे, फिर देखना कैसे यहाँ से वहां भागेगा. मज़ा आ जायेगा.”

रात आठ बजे दोनों ने एक पब्लिक फोन से हिरण को फोन किया. सियार ने अपनी आवाज़ बदल कर कहा, “मेरा नाम गब्बर सिंह है, आज रात मैं ‘अपना बैंक’ लूटने वाला हूँ. अगर तुम ने यह बात किसी को बताई तो मैं तुम्हें मार डालूँगा.’

जैसा सियार और भेड़िये ने सोचा था वैसा ही हुआ. हिरण के होश उड़ गये. उसे समझ ही न आया कि पुलिस को सुचना दे या  फिर अपने मैनेजर को यह बात बताये.
उसकी पत्नी ने पूछा, “किस का फोन था? इतने घबराये हुए क्यों हो?”

हिरण ने झट से सारी बात बता दी. बात सुन कर उसकी पत्नी हंस पड़ी और बोली, “भूल गये आज पहली अप्रैल है. कोई तुम्हें मूर्ख बनाने की कोशिश कर रहा है, अप्रैल फूल. अगर कोई डाकू सच में बैंक लूटने की सोच रहा है तो वह फोन करके पहले ही क्यों बता देगा?”

“बात तो तुम सच कह रही हो. मैं यूहीं डर रहा हूँ,” हिरण ने कहा और खाना खाने बैठ गया.


रात दस बजे के आस-पास हिरण को थोड़ी उलझन होने लगी. उसने सोचा अगर बैंक में सच में चोरी हो गई तो दोष उस पर भी आयेगा. उसने पत्नी से कहा, “एक बार बैंक का चक्कर लगा ही आता हूँ. सब ठीक ही होगा पर देख कर तसल्ली हो जायगी.”

Tuesday, 24 March 2015



एक सूफ़ी कहानी

रात का समय था. एक चोर एक घर में घुसने की कोशिश करने लगा. चोर खिड़की के रास्ते घर के भीतर घुस रहा था. अचानक खिड़की टूट कर चोर के हाथ पर आ गिरी. चोर का हाथ टूट गया.

चोर ने क़ाज़ी¹ के सामने शिकायत कर दी. उसका आरोप था कि उस घर का मालिक दोषी था, उसके कारण ही चोर का हाथ टूट गया था.

घर का मालिक क़ाज़ी के सामने उपस्थित हुआ. उसने क़ाज़ी से कहा, “हुजूर,  दोष मेरा नहीं उस बढ़ई² का है जिसने यह खिड़की बनाई थी. बढ़ई ने खिड़की बनाने में अवश्य कोई गलती की होगी जो खिड़की टूट कर गिर गई और इस आदमी का हाथ टूट गया.”

क़ाज़ी के आदेश पर बढ़ई आया. उसने क़ाज़ी से कहा, “हुजूर, मैंने तो खिड़की बनाने में कोई गलती नहीं की. गलती मिस्त्री³ की है. उसने खिड़की सही ढंग से नहीं लगाई थी. उसे ही सज़ा मिलनी चाहिए.”

अब मिस्त्री को बुलाया गया. मिस्त्री ने कहा, “हुजूर, मैं तो बहुत अच्छा कारीगर हूँ और अपने काम में कभी कोई गलती नहीं करता. पर जब में खिड़की लगा रहा था तब एक औरत वहां से गुज़र रही थी. मैं उस औरत को देखने लगा और खिड़की सही ढंग से न लगी. गलती मेरी नहीं उस औरत की है. अगर वह उस समय वहां से न गुज़रती तो मुझसे कोई गलती न होती.”

औरत को भी क़ाज़ी के सामने उपस्थित होना पड़ा. उसने क़ाज़ी से कहा, “ मैं तो एक साधारण औरत हूँ. कोई मुझे नहीं देखता. लोग तो मेरे सुंदर सतरंगी दुपट्टे को देखते हैं. दोष मेरा नहीं उस रंगरेज़° का है जिसने मेरा दुपट्टा रंगा था.”  

क़ाज़ी ने रंगरेज़ को बुलवाया. पर रंगरेज़ तो वही आदमी निकला जो उस घर में चोरी करने गया था और जिसका हाथ टूट गया था. वह उस औरत का पति था और उसी ने क़ाज़ी के सामने शिकायत की थी.
*******

इस सूफी कहानी का अभिप्राय है की अपने सब कर्मो का फल हमें ही भोगना होगा. कोई अन्य हमारे कर्मों का भागीदार नहीं हो सकता.


¹ क़ाज़ी – Judge
² बढ़ई -  Carpenter
³ मिस्त्री -Mason
º रंगरेज़ –Dyer 

Monday, 23 March 2015


दीक्षा

भगवान बुद्ध, प्रसन्नता से बैठे, अपने शिष्यों के साथ चर्चा कर रहे थे. तभी एक व्यक्ति ने आकर भगवान बुद्ध पर थूक दिया.

बुद्ध ने एक कपड़े से थूक को पोंछ कर, मुस्कुराते हुए, उस व्यक्ति से पूछा, “भाई, क्या तुम्हें कुछ और कहना है?”

वह व्यक्ति सकपका गया. उसने तो सोच रखा था कि बुद्ध और उनके शिष्य उसे बुरा-भला कहेंगे, उससे झगड़ा करने लगेंगे. पर बुद्ध तो इतने प्यार और आदर से उससे बात कर रहे थे कि जैसे उसने उनका सम्मान किया हो.

उस व्यक्ति को समझ ही न आया कि वह क्या कहे. वह कुछ बोल न पाया और घबरा कर वहां से चल दिया.

उसके जाते ही बुद्ध का एक शिष्य, आनंद, बोला, “भगवन, हम तो आपका सम्मान कर चुप रहे, अन्यथा ऐसे दुष्ट व्यक्ति को तो हम दण्डित करते.”

बुद्ध ने मुस्कुरा कर कहा, “आनंद, मुझे उस व्यक्ति के व्यवहार पर नहीं, तुम्हारे व्यवहार पर आश्चर्य हो रहा है. मेरी शिक्षा का तुम पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा लगता. उस व्यक्ति के मन में कोई बात रही होगी, किसी बात पर उसे गुस्सा होगा, शायद मुझ पर चिल्लाने से या मुझे गाली देने से उसके मन की फांस न निकलती होगी, इसी कारण उसने मुझ पर थूक दिया. मुझ पर थूक कर उसने अपने मन की फांस निकाल ली. पर तुम्हें क्या हुआ? तुम्हें तो अपने मन को अपने वश में रखना चाहिये. ऐसा व्यवहार मेरे शिष्य को शोभा नहीं देता”

भगवान बुद्ध की बात सुन आनंद को बहुत ग्लानि हुई. उसे अपनी भूल का अहसास हुआ.

उधर जिस व्यक्ति ने बुद्ध पर थूका था वह बुद्ध के विनम्र व्यवहार से विचलित हो गया था. उसे लग रहा था की उसने बहुत बड़ी भूल कर दी थी. उसे अपने अभद्र व्यवहार पर पछतावा होने लगा. वह रात भर सो न पाया और दिन होते ही बुद्ध के आश्रम की ओर दौड़ा.

आश्रम में वह भगवान बुद्ध के चरणों में झुक गया और अपनी भूल की क्षमा मांगने लगा.

बुद्ध ने कहा, “जिसे तुम ने अपमानित किया था वह मैं नहीं हूँ, वह पुरुष तो कब जा चुका. हम सब हर पल, हर घड़ी बदल रहे हैं, नवीन हो रहे हैं, जैसे गंगा हर पल, हर घड़ी बदलती रहती है. जिस गंगा में तुम एक बार उतरते हो उस गंगा में तुम दुबारा कभी नहीं उतर सकते. मैं वह पुरुष नहीं है जिस पर कल तुम ने थूक दिया था. तुम भी वह व्यक्ति नहीं हो जिसने बुद्ध पर थूका था. इसलिये तुम्हें मुझ से क्षमा मांगने की कोई आवश्यकता नहीं. जाओ और अपने मन कोई भी फांस न रखो.”

भगवान बुद्ध की बातों ने उस व्यक्ति को इतना प्रभावित किया कि उसने भगवन से दीक्षा ले ली.


Tuesday, 17 March 2015





बादल
एक झूमता बादल का टुकडा
पर आज था कुछ उखड़ा-उखड़ा
साथ न था कोई मन का मीत

अपनों ने क्यों संग था छोड़ा

Friday, 13 March 2015

A Beautiful Sunny Day



On a beautiful sunny day
not far from a  curved bay,
where land turns into a swamp,
on a log that looked like ramp
was reclining Mr Frog,
for he loved  morning air sans smog.
His belly was full of little snails
and small fish and their tails.
He closed his eyes to take a nap
but was startled by a sudden splash.
He glared with anger in each eye
and saw Mr Crocodile floating nearby.
Mr Crocodile was trying to climb the log;
he too was fond of air sans smog,
and loved to sleep in the morning Sun,
sleeping soundly was nothing but fun.
Mr Crocodile was as polite as he could be
“Froggy, get up and quickly flee.”
Now we know Mr Frog was very proud
he was not one who would get cowed.
He too was as polite as he could be
"Crocky, get lost or I’ll break your knee.”
Mr Crocodile looked a bit amused;
he couldn’t believe Mr Frog had refused
to run and make place for him;
things were about to turn grim.
“Froggy, do you really want to fight,
 wonder what’s going to be your plight”
“Crocky, don’t you think I aren’t brave
many a fool I have sent to the grave.”
But snooty Mr Frog was not at all aware,
a red-tailed hawk was present there;
The hawk dived when his time came,
Mr Frog had himself to blame;
for he was about to become a tasty meal
of a hungry hawk with claws of steel.
But Mr Crocodile  took pity on the frog
he quietly pushed the wooden log;
the hawk fumbled which he rarely did
and he failed to catch Mr Frog indeed.
Mr Frog was one who missed a beat
and his heart began to widely tweet.
Mr Crocodile had done him a kind deed
and saved him from becoming hawk-feed.
The hawk knew he had lost his chance
and he left quickly even without a glance.
Mr Frog looked at Mr Crocodile but felt shy,
he was sorry and we all know why.

© i b arora

Thursday, 12 March 2015

दो यार



बन्दर और भालू में
इक दिन होने लगी तकरार
वैसे थे वो दोनों ही
एक दूसरे के पक्के यार  

बन्दर बोला “तुम जैसा आलसी
देखा नहीं मैंने आज तक”
भालू बोला “तुम ही करते हो
हरदम इतनी ज़्यादा झकझक”

“भालू, तन के तो हो तुम भूरे
पर मन तुम्हारा है काला”
“बन्दर, तुम चालाक हो कितने
यह है सबने देखा भाला.”

बन्दर तब गुस्से से चिल्लाया
“आज खाओगे तुम मुझसे मार”
भालू भी आँख दिखा कर बोला  
“अरे मैं तो हूँ कब से तैयार”

दोनों को लड़ता देख
सभी को आया खूब मज़ा
उनकी शैतानी की उनको
मिलनी थी आज सज़ा.

दोनों मिलकर सब को
करते थे खूब हैरान   
उन बदमाशों के कारण 
हर कोई था खूब परेशान   

पर आज सभी ने
इक अवसर पाया
सब ने ही मिलकर
दोनों को उकसाया

दोनों हो गये आग बबूला
आगा पीछा दोनों ने भूला
एक दूसरे पर टूट पड़े
और लातें घूसें खूब झड़े

भालू का टूट गया इक दाँत
बहने लगा खून नाक से
बन्दर का टूट गया इक हाथ 
टपकने लगे आंसू आँख से.

हाथी ने किया तब बीच-बचाव
और दोनों को डांट लगाई
“हुआ क्या है मुझे बताओ
और बंद करो यह हाथा-पाई”

बन्दर और भालू दोनों
खड़े हो गये मुंह लटका कर
किस बात पर थे वह झगड़े
याद न था यह उनको पर

अब हाथी थोड़ा चकराया
और दोनों पर वह चिल्लाया
“जब बात न थी लड़ने की कोई  
लड़ कर तुम ने क्या पाया”

सब को उन पर आई हँसी
सब ने था उनको उकसाया
“अपनी शैतानी का फल, दादा 
आज है इन दोनों ने पाया”

बन्दर और भालू को अब 
समझ आई भूल अपनी
“अब न करेंगे किसी को तंग
मन में यह हमने ठानी”

© आई बी अरोड़ा

Thursday, 5 March 2015

होली आई




होली आई होली आई
ज़ोर से बोला भालू भाई
रंगों की पिचकारी लेकर
 लोमड़ी झटपट दौड़ी आई

बन्दर भी भागा भागा आया
मुंह अपने पर ही रंग लगाया
बन्दर पर थी मस्ती छाई
होली थी उसकी मन भायी

भालू ने हाथी पर रंग डाला
मुंह उसका नीला कर डाला
पर हाथी भी था न कोई कम
भालू को उसने पीला रंग डाला

लाल गुलाल और हल्का पीला
हरा बैंगनी और पक्का नीला
जिसने  भी जो रंग पाया
उसी रंग में सबको नहलाया

पर एक जानवर ऐसा भी था
जिसको कोई रंग न पाया 
छिप कर था वह बैठा घर में
 कोई उसे ढूंढ न पाया

वह तो था जंगल का राजा
रंगों से था वह पर डरता
होली पर वह छिप कर रहता
होली पर वह नाटक करता

लोमड़ी भी थी खूब चालाक
शेर को उसने ढूंढ निकाला
शेर छिपा था बिस्तर के नीचे
सबने उसको खींच निकाला

शेर बहुत ज़ोर से चिल्लाया
“बहुत बीमार हूँ मैं भाइया
रात भर मुझ को नींद न आई
 कुछ तो तरस करो तुम भाई”

कौन था पर उसकी सुनने वाला 
यह नाटक था देखा भाला
सब ने उस पर हर रंग डाला
और मुंह कर दिया थोड़ा काला

फिर सब मिलकर सुर में गाये
“साल में इक बार होली आये  
होली में जो भी छिप जाए
उसे तो बस भगवान बचाये



© आई बी अरोड़ा